Friday, August 17, 2007

आरज़ू

है बुझा सा दिल,
कभी तो आ कर तू मुझे मिल...
मुझे इक हँसी दे जा,
मेरे कानों में कुछ चुपके से कह जा,
मुझे गले लगा के ठहर जा कुछ पल,
आज ही आ किसने देखा है कल,
दीवानगी चाहे इसे कहे कोई,
जानता है जो सहे वो ही,
चाह किसी के पास होने की,
चैन से फिर कुछ पल यूँ सोने की,
पर इक बुझे से दिल में सब है धुआँ,
हर चैन जाने खोया है कहाँ,
ना उम्मीद, ना आरज़ू, ना इल्तेजाह कोई ,
राख के समंदर में रूह है सोई,
ना अब्र है, ना रौशनी है, ना हवा है,
नहीं जानते कि अब हम कहाँ हैं,
बुझा है दिल,महफिल में कोई शमा जलाए,
किसी बहाने से हम उनसे मिलने जाये...

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